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होली में फट गई चोली भाग ८
#1
मैं अब सीधे उसके ऊपर चढ़ गई और और अपनी प्यासी चूत उसके किशोर, गुलाबी, रसीले होंठों पे रगड़ने लगी. वो भी कम चुदक्कड नहीं थी, चाटने और चुसने में उसे भी मज़ा आ रहा था. उसके जीभ की नोंक मेरे Clit (चूत का लहसुन) को छेड़ती हुई मेरे पेशाब के छेद को छू गई. और मेरे पूरे बदन में सुरसुरी मच गई. मुझे वैसे भी बहुत कस के लगी थी, सुबह से 5-6 गिलास शरबत पी कर और फिर सुबह से की भी नहीं थी.
(मुझे याद आया कि कल रात मेरी ननद ने छेड़ा था कि भाभी आज निपट लीजिए, कल होली के दिन Toilet में सुबह से ही ताला लगा दूंगी. और मेरे बिना पूछे बोला कि अरे यही तो हमारे गाँव की होली की.खास कर नई बहु के आने पे होने वाली होली की spaciality है. जेठानी और सास दोनों ने आँख तर्रेर कर उसे मना किया और वो चुप हो गई.)

मेरे उठने की कोशिश को दोनों जेठानियो ने बेकार कर दिया और बोली, "हाय, आ रही है तो कर लो ना.इतनी मस्त ननद है.और होली का मौका.ज़रा पिचकारी से रंग की धार तो बरसा दो.छोटी प्यारी ननद के ऊपर."
मेरी जेठानी ने कहा, "और वो बेचारी तेरी चूत की इतनी सेवा कर रही है.तू भी तो देख ज़रा उसकी चूत ने क्या-क्या मेवा खाया है..???"
मैंने गप्प से उसकी चूत में मोटी उंगली घुसेड़ दी. मेरी छोटी छिनाल ननद सीत्कार उठी. उसकी चूत लस-लसा रही थी. मेरी दुसरी उंगली भी अंदर हो गई. मैंने दोनों उंगलिया उसकी चूत से निकाल के मुँह में डाल ली.. वाह क्या गाढ़ी मक्खन-मलाई थी..?? एक पल के लिये मेरे मन में ख्याल आया कि मेरी ननद की चूत में किसका लंड अभी गया था.? लेकिन सर झटक के मैं मलाई का स्वाद लेने लगी. वाह क्या स्वाद था.? मैं सब कुछ भूल चुकी थी कि तब तक मेरी शरारती जेठानियो ने मेरे सुर्सुराते छेद को छेड दिया और बिना रुके मेरी धार सीधे छोटी ननद के मुँह में..

दोनों जेठानियो ने इतनी कस के उसका सर पकड़ रखा था कि वो बेचारी हिल भी नहीं सकती थी और एक ने मुझे दबोच रखा था. थोड़ी देर तो मैंने भी हटने की कोशिश की लेकिन मुझे याद आया कि अभी थोड़ी देर पहले ही, मेरी जेठानी पड़ौस की उस ननद को.. और वो तो इससे भी कच्ची थी.

"अरे होली में जब तक भाभी ने पटक के ननद को अपना खास असल खारा शरबत नहीं पिलाया, तो क्या होली हुई..???" एक जेठानी बोली.
दुसरी बोली, "तू अपनी नई भाभी की चूत चाट और उसका शरबत पी और मैं तेरी कच्ची चूत चाट के मस्त करती हूँ."
मैं मान गई अपनी ननद को, वास्तव में धार के बावजूद वो चाट रही थी. इतना अच्छा लग रहा था कि मैंने उसका सर कस के पकड़ लिया और कस-कस कर अपनी बुर उसके मुँह पे रगड़ने लगी. मेरी धार धीरे-धीरे रुक गई और मैं झड़ने के कगार पर थी कि मेरी एक जेठानी ने मुझे खींच के उठा दिया. लेकिन मौके का फायदा उठा के मेरी ननद निकल भागी और दोनों जेठानिया उसके पीछे.

मैं अकेले रह गई थी. थोड़ी देर मैं सुस्ता रही थी कि 'उईईईई' की चीख आई, उस तरफ़ से जिधर मेरे भाई का कमरा था. मैं उधर दौड़ के गई. मैं देख के दंग रह गई. उसकी Half-Pent घुटनों तक नीचे सरकी हुई और उसके चूतडों के बीच में 'वो'.
'इनका' मोटा लाल गुस्साया सुपाड़ा पूरी तरह उसकी गाण्ड में पैबस्त. वो बेचारा अपने चूतड़ पटक रहा था लेकिन मैं अपने experience से अच्छी तरह समझ गई थी कि अगर एक बार सुपाड़ा घुस गया तो ये बेचारा लाख कोशिश कर ले 'इनका' मुसल बाहर नहीं निकलने वाला. उसकी चीख अब गों-गों की आवाज़ में बदल गई थी. उसके मुँह की ओर मेरा ध्यान गया तो ननदोई ने अपना लंड उसके मुँह में ठेल रखा था. लम्बाई में भले वो 'मेरे इनसे' 19 हो लेकिन मोटाई में तो उनसे भी कहीं ज्यादा, मेरी मुट्ठी में भी मुश्किल से समा पाता.
मेरी नज़र सरक कर मेरे भाई के शिश्न पर पड़ी. बहुत प्यार, सुन्दर-सा गोरा, लम्बाई में तो वो 'मेरे उनके' और ननदोई के लंड के आगे कही नहीं टिकता, लेकिन इतना छोटा भी नहीं, कम से कम 6 inch का तो होगा ही, छोटे केले की तरह और एकदम कड़ा...
गाण्ड में मोटा लंड मिलने का उसे भी मज़ा मिल रहा था. ये पता इसी से चल रहा था. वो उसके केले को मुट्ठिया रहे थे और उसका लिची जैसा गुलाबी सुपाड़ा खुला हुआ बहुत प्यारा लग रहा था. बस मन कर रहा था कि गप्प से मुँह में ले लूँ और कस-कस कर दो-चार चुप्पे मार लूँ. मेरे मुँह में फिर से वो स्वाद आ गया जो मेरी छोटी ननद के बुर में उंगलियां निकाल के चाटते समय मेरे मुँह में आया था. अगर अभी वो मिल जाती तो सच में बिना चुसे ना छोडती.

मैं उस समय इतनी चुदासी हो रही थी कि बस...
"पी साले पी.. अगर मुँह से नहीं पिएगा तो तेरी गाण्ड में डाल के ये बोतल खाली कराएँगे."
ननदोई ने दारू की बोतल सीधे उसके मुँह में लगा के उड़ेल दी. वो घुटुर-घुटुर कर के पी रहा था. कड़ी महक से लग रहा था कि ये देसी दारू की बोतल है. उसका मुँह तो बोतल से बंद था ही, 'इन्होने' एक-दो और धक्के कस के मारे. बोतल हटा के ननदोई ने एक बार फिर से उसके गोरे-गोरे कमसिन गाल सहलाते हुए फिर अपना तन्नाया लंड उसके मुँह में घुसेड़ दिया.
'इन्होने' आँख से ननदोई जी को इशारा किया, मैं समझ गई कि क्या होने वाला है.? और वही हुआ.
ननदोई ने कस के उसका सर पकड़ा और मोटा लंड पूरी ताकत से अंदर पेल के उसका मुँह अच्छी तरह बंद कर दिया और मजबूती से उसके कंधे को पकड़ लिया. उधर 'इन्होने' भी उसका शिश्न छोड़ के दोनों हाथों से कमर पकड़ के वो करारा धक्का लगाया कि दर्द के मारे वो बिलबिला उठा. बेचारा घूं-घूं के सिवाय कुछ न क सका. लेकिन बिना रुके एक के बाद एक 'ये' कस-कस के पलते रहे. उसके चेहरे का दर्द. आँखों में बेचारे के आँसू तैर रहे थे. लेकिन मैं जानती थी कि ऐसे समय रहम दिखाना ठीक नहीं और 'इन्होंने' भी Almost पूरा लौड़ा उसकी कसी गाण्ड में ठूस दिया.

वो छटपटाता रहा, गाण्ड पटकता रहा, घूं-घूं करता रहा लेकिन बेरहमी से वो ठेलते रहे. मोटा लंड मुँह में होने से उसके गाल भी पुरे फुले और आँखे तो मानो निकल पड़ रही थी.
"बोल साल्ले, मादरचोद, तेरी बहन की माँ का भोसड़ा मारूं... बोल मज़ा आ रहा है गाण्ड मराने में.???" उसके चूतड़ पे धौल जमाते हुए 'ये' बोले.
ननदोई जी ने एक पल के लिए अपना लंड बाहर निकाल लिया और वो भी हँस के बोले, "Idea अच्छा है.. तेरी सास बड़ी मस्त माल है... क्या चुचियाँ है उसकी..!!!! पूछ इस साले से चुदवायेगी वो..??? साईज क्या है उस छिनाल की चुचियों की..???"
"बोल साले, क्या साईज है उस की चुचियों की.?? माल तो बिंदास है.." उसके बाल खींचते हुए 'इन्होने' उसके गाल पे एक आँसू चाट लिया और कच-कचा के गाल काट लिया...
"38 DD" वो बोला.
"अबे भोसड़ी के, क्या 38 DD.?? साफ-साफ बोल..." उसके गाल पे अपने लंड से सटासट मारते ननदोई जी बोले...
"सीना...छाती..चूची.." वो बोला.

"सच में..?? जैसे तेरी कसी गाण्ड मारने में मज़ा आ रहा है वैसे उस की भी बड़ी-बड़ी चुचियाँ पकड़ के मस्त चूतडों के बीच... हाए क्या गाण्ड है.?? बहोत मज़ा आएगा..!!!" 'ये' बोले और बचा-कुचा लंड भी ठेल दिया. मेरे छोटे भाई की तो चीख ही निकल गई..
मैं सोच रही थी कि तो क्या मेरी माँ के साथ भी... छी कैसा-कैसा सोचते है ये..??? वैसे ये बात सही भी थी कि मेरी माँ की चुचियाँ और चूतड़ बहुत मस्त थे, और हम सब बहने बहुत कुछ उनपे गई थी. वैसे भी बहुत दिन हो गए होंगे, उनकी बुर को लंड खाए हुए.
"क्या मस्त गाण्ड मराता है तू यार.. मजा आ गया. बहुत दिन हो गए ऐसी मस्त गाण्ड मारे हुए." हल्के-हल्के गाण्ड मरते हुए 'ये' बोले.
ननदोई जी कभी उसे चुम रहे थे तो कभी उससे अपना सुपाड़ा चुसवा-चटवा रहे थे. उन्होंने पूछा, "क्या हुआ जो तुझे इस साले की गाण्ड में ये मज़ा आ रहा है.???"

वो बोले, "अरे इसकी गाण्ड, जैसे कोई कोई हाथ से लंड को मुट्ठीयाते हुए दबाए, वैसे लंड को भींच रही है. ये साला Natural गाण्डू है" और एक झटके में सुपाड़े तक लंड बाहर कर के सटा-सट गपा-गप उसकी गाण्ड मारना शुरू कर दिया.
मैंने देखा कि जब उनका लंड बाहर आता तो 'इनके' मोटे मुसल पे उसकी गाण्ड का मसाला... लेकिन मेरी नज़र सरक के उसके लंड पे जा रही थी. सुन्दर सा प्यारा, कड़ा, कभी मन करता था कि सीधे मुँह में ले लु तो कभी चूत में लेने का.
तभी सुनाई पड़ा. 'ये' बोल रहे थे, "साले, आज के बाद से कभी मना मत करना गाण्ड मराने के लिए, तुझे तो मैं अब पक्का गाण्डू बना दूँगा और कल होली में तेरी सारी बहनों की गाण्ड मारूंगा, चूत तो चोदुंगा ही. तुझे तेरी कौन छिनाल बहन पसंद है.? बोल साले.. इस गाण्ड मराने के लिये तुझे अपनी साली ईनाम में दूँगा."

मैंने मन में कहा कि ईनाम में तो वो 'इनकी' छोटी बहन की मस्त कच्ची चूत कि seal सुबह ही खोल चुका है.
वो बोला, "सबसे छोटी वाली.लेकिन अभी वो छोटी है."
"अरे उसकी चिन्ता तू छोड़. चोद-चोद कर इस होली के मौके पे तो मैं उसकी चूत का भोसड़ा बना दूँगा और अपनी सारी सालियों को रंडी की तरह चोदुंगा. चल तू भी क्या याद रखेगा.? सारी तेरी बहनों को तुझसे चुदवा के तुझे गाण्डू के साथ नम्बरी बहनचोद भी बना दूँगा."
उन लोगों ने तो बोतल पहले ही खाली कर दी थी. ननदोई उसे भी आधी से ज्यादा देसी बोतल पिला के खाली कर चुके थे और वो भी नशे में मस्त हो गया था.
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