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होली में फट गई चोली भाग ५
#1
बाहर सारे लोग मेरी जेठानी, सास और दोनों ननदें होली की तैयारी के साथ.
"अरे भाभी, ये आप सुबह-सुबह क्या कर... मेरा मतलब करवा रही थी.? देखिये आपकी सास तैयार है" बड़ी ननद बोली.
(मुझे कल ही बता दिया था कि नई बहु की होली की शुरुआत सास के साथ होली खेल के होती है और इसमें शराफ़त की कोई जगह नहीं होती, दोनों खुल के खेलते है.).
जेठानी ने मुझे रंग पकड़ाया. झुक के मैंने आदर से पहले उनके पैरों में रंग लगाने के लिये झुकी तो जेठानी जी बोली, "अरे आज पैरों में नहीं, पैरों के बीच में रंग लगाने का दिन है."

और यही नहीं उन्होंने सासु जी का साड़ी साया (Peticot) भी मेरी सहायता के लिये उठा दिया. मैं क्यों चुकती.? मुझे मालूम था की सासु जी को गुद-गुदी लगती है. मैंने हल्के से गुद-गुदी की तो उनके पैर पूरी तरह फ़ैल गए. फिर क्या था.? मेरे रंग लगे हाथ सीधे उनकी जांघ पे. इस उम्र में भी (और उम्र भी क्या.? 40 से कम की ही रही होगी.), उनकी जांघें थोड़ी स्थूल तो थी लेकिन एकदम कड़ी और चिकनी बिलकुल केले के तने जैसी. अब मेरा हाथ सीधे जांघों के बीच में. मैं एक पल सहमी, लेकिन तब तक जेठानी जी ने चढ़ाया, "अरे जरा अपने ससुर जी की कर्मभूमि और पति की जन्म-भूमि का तो स्पर्श कर लो."

उंगलियां तब तक घुंघराली रेशमी जाटों को छू चुकी थी. (ससुराल में कोई भी Panty नहीं पहनता था, यहाँ तक कि मैंने भी पहनना छोड़ दिया.). मुझे लगा की कहीं मेरी सास बुरा ना मान जाये लेकिन वो तो और खुद बोली, "अरे स्पर्श क्या, दर्शन कर लो बहु."
और पता नहीं उन्होंने कैसे खिंचा कि मेरा सर सीधे उनकी जांघों के बीच. मेरी नाक एक तेज तीखी गंध से भर गई. जैसे वो अभी-अभी (Bathroom) कर के आयी हो और उन्होंने जब तक मैं सर निकलने का प्रयास करती कस के पहले तो हाथों से पकड़ के फिर अपनी भारी-भारी जांघों से कस के दबोच लिया. उनकी पकड़ उनके लड़के की पकड़ से कम नही थी. मेरे नथुनों में एक तेज महक भर गई और अब वो उसे मेरी नाक और होंठों से हल्के से रगड़ रही थी.
हल्के से झुक के वो बोली, "दर्शन तो बाद में कराउंगी पर तब तक तुम स्वाद तो ले लो थोड़ा."

जब मैं किसी तरह वहाँ से अपना सर निकल पाई तो वो तीखी गंध अब एकदम मस्त वाली सी तेज, मेरा सर घूम-सा रहा था. एक तो सारी रात जिस तरह उन्होंने तडपाया था, बिना एक बार भी झड़ने दिये और ऊपर से ये.!!! मेरा सर बाहर निकलते ही मेरी ननद ने मेरे होंठों पे एक चांदी का गिलास लगा दिया लबालब भरा, कुछ पीला-सा और होंठ लगते ही एक तेज भभका सा मेरे नाक में भर गया.
"अरे पी ले, ये होली का खास शर्बत है तेरी सास का.. होली की सुबह का पहला प्रसाद." ननद ने उसे धकेलते हुए कहा. सास ने भी उसे पकड़ रखा था. मेरे दिमाग में कल गुझिया बनाते समय होने वाली बातें आ गई. ननद मुझे चिढ़ा रही थी कि भाभी कल तो खारा शरबत पीना पड़ेगा, नमकीन तो आप है ही, वो पी के आप और नमकीन हो जायेंगी. सास ने चढ़ाया था, "अरे तो पी लेगी मेरी बहु.तेरे भाई की हर चीज़ सहती है तो ये तो होली की रस्म है.."
जेठानी बोली, "ज्यादा मत बोलो, एक बार ये सीख लेगी तो तुम दोनों को भी नहीं छोड़ेगी."
मेरे कुछ समझ में नही आ रहा था.

मैं बोली, "मैंने सुना है की गाँव में गोबर से होली खेलते है."
बड़ी ननद बोली, "अरे भाभी गोबर तो कुछ भी नहीं.. हमारे गाँव में तो.."
सास ने इशारे से उसे चुप कराया और मुझसे बोली, "अरे शादी में तुमने पञ्च गव्य तो पिया होगा. उसमे गोबर के साथ गो-मूत्र भी होता है."
मैं बोली, "अरे गो-मूत्र तो कितनी आयुर्वेदिक दवाओ में पड़ता है.." उसमे मेरी बात काट के बड़ी ननद बोली कि "अरे गो माता है तो सासु जी भी तो माता है और फिर इंसान तो जानवरों से ऊपर ही तो..फिर उसका भी चखने में.."
मेरे ख्यालो में खो जाने से ये हुआ कि मेरा ध्यान हट गया और ननद ने जबरन 'शरबत' मेरे ओंठों से नीचे.. सासु जी ने भी जोर लगा रखा था और धीरे-धीरे कर के मैं पूरा डकार गई. मैंने बहुत दम लगाया लेकिन उन दोनों की पकड़ बड़ी तगड़ी थी. मेरे नथुनों में फिर से एक बार वही महक भर गई जो जब मेरा सर उनकी जांघों के बीच में था.
लेकिन पता नहीं क्या था मैं मस्ती से चूर हो गई थी. लेकिन फिर भी मेरे कान में किसी ने कहा, "अरे पहली बार है ना, धीरे-धीरे स्वाद की आदि हो जाओगी. जरा गुझिया खा ले, मुँह का स्वाद बदल जायेगा."
मैंने भी जिस डब्बे में कल बिना भाँग वाली गुझिया रखी थी, उसमे से निकल के दो खा ली. (वो तो मुझे बाद में पता चला, जब मैं 3-4 निगल चुकी...कि ननद ने रात में ही डिब्बे बदल दिये थे और उसमे Double Dose वाली भांग की गुझिया थी).
कुछ ही देर में उसका असर शुरू हो गया. जेठानी ने मुझे ललकारा, "अरे रुक क्यों गई.? अरे आज ही मौका है सास के ऊपर चढाई करने का..दिखा दे कि तुने भी अपनी माँ का दूध पिया है."
और उन्होंने मेरे हाथ में गाढ़े लाल रंग का Pant दे दिया सासु को लगाने को.

"अरे किसके दूध की बात कर रही है.? इसकी पञ्च भतारी, छिनाल, रंडी, हराम चोदी माँ, मेरी समधन की. उसका दूध तो इसके मामा ने, इसके माँ के यारों ने चूस के सारा निकल दिया. एक चूची इसको चुसवाती थी, दूसरी इसके असली बाप, इसके मामा के मुँह में देती थी."
सास ने गालियों के साथ मुझे चैलेंज किया. मैं क्यों रूकती.? पहले तो लाल रंग मैंने उनके गालों पे और मुँह पे लगाया. उनका आँचल ढलक गया था, चोली से छलकते उनके बड़े-बड़े स्तन... मुझसे रहा न गया, होली का मौका, कुछ भाँग और उस शरबत का असर, मैंने चोली के अंदर हाथ डाल दिया.

वो क्यों रूकती.? उन्होंने जो मेरी चोली को पकड़ के कस के खिंचा तो आधे हुक टूट गए. मैंने भी कस के उनके स्तनों पे रंग लगाना और मसलना शुरू कर दिया. क्या जोबन थे.? इस उम्र में एकदम कड़े-तनक, गोरे और खूब बड़े-बड़े. कम से कम 38DD रहे होंगे.
मेरी जेठानी बोली, "अरे जरा कस के लगाओ, यही दूध पी के मेरा देवर इतना ताकतवर हो गया है."
कि रंग लगाते दबाते मैंने भी बोला, "मेरी माँ के बारे में कह रही थी ना, मुझे तो लगता है की आप अभी भी दबवाती, चुसवाती है. मुझे तो लगता है की सिर्फ बचपन में ही नहीं जवानी में भी वो इस दूध को पीते, चूसते रहे है. क्यों है ना..?? मुझे ये शक तो पहले से था की उन्होंने अपनी बहनों के साथ अच्छी Trainning की है लेकिन आपके साथ भी.???"
मेरी बात काट के जेठानी बोली, "तू क्या कहना चाहती है की मेरा देवर माआआ..दर...."

"जी.. जो आपने समझा कि वो सिर्फ बहनचोद ही नहीं मादरचोद भी है." मैं अब पुरे मूड में आ गई थी..
"बताती हूँ तुझे..." कह के मेरी सास ने एक झटके में मेरी चोली खिंच के नीचे फेंक दी और मेरे दोनों ऊरोज सीधे उनके हाथ में.
"बहोत रस है ना तेरी इन चुचियों में, तभी तो सिर्फ मेरा लड़का ही नहीं गाँव भर के मरद बेचारों की निगाह इनपे टिकी रहती है. जरा आज मैं भी तो मज़ा ले के देखूं." और रंग लगाते-लगाते उन्होंने मेरा Nipple Pinch कर दिया.
"अरे सासु माँ, लगता है आपके लड़के ने कस के चूची मसलना आपसे ही सिखा है. बेकार में मैं अपनी ननदों को दोष दे रही थी. इतना दबवाने, चुसवाने के बाद भी इतनी मस्त है आपकी चूचियां..." मैं भी उनकी चूची कस के दबाते बोली.
मेरी ननद ने रंग भरी बाल्टी उठा के मेरे ऊपर फेंकी. मैं झुकी तो वो मेरी चचेरी सास और छोटी ननद के ऊपर जा के पड़ी. फिर तो वो और आस-पास की दो-चार औरतें जो रिश्ते में सास लगती थी, मैदान में आ गई. सास का भी एक हाथ सीने से सीधे नीचे, उन्होंने मेरी साड़ी उठा दी तो मैं क्यों पीछे रहती..??? मैंने भी उनकी साड़ी आगे से उठा दी. अब सीधे देह से देह... होली की मस्ती में चूर अब सास-बहु हम लोग भूल चुके थे. अब सिर्फ देह के रस में डूबे हम मस्ती में बेचैन... मैं लेकिन अकेले नहीं थी.

जेठानी मेरा साथ देते बोली, "तू सासु जी के आगे का मज़ा ले और मैं पीछे से इनका मज़ा लेती हूँ. कितने मस्त चूतड़ है.? हाय..."
कस कस के रंग लगाती, चूतड़ मसलती वो बोली, "अरे तो क्या मैं छोड़ दूंगी इस नए माल के मस्त चूतडो को...??? बहोत मस्त गाण्ड है. एकदम गाण्ड मराने में अपनी छिनाल, रंडी माँ को गई है लगता है. ज़रा देखू गाण्ड के अंदर क्या माल है.??" ये कह के मेरी सास ने भी कस के मेरे चूतडो को भींचा और रंग लगाते, दबाते, सहलाते, एक साथ ही दो उंगलियां मेरी गाण्ड में गचाक से पेल दी.

"उईई माँ..." मैं चीखी पर सास ने बिना रुके सीधे जड़ तक घुसेड़ के ही दम लिया. तब तक मेरी एक चचेरी सास ने एक गिलास मेरे मुँह में, वहीं तेज वैसी ही महक, वैसा ही रंग. लेकिन अब कुछ भी मेरे बस में नहीं था. दो सासुओं ने कस के दबा के मेरा मुँह खोल दिया और चचेरी सास ने पूरा गिलास खाली कर के दम लिया और बोली, "अरे मेरा खारा शरबत तो चख."
फिर उसी तरह दो-तीन गिलास और...

उधर मेरे सास के एक हाथ की दो उंगलियां गोल-गोल कस के मेरी गाण्ड में घुमती, अंदर-बाहर होती और दूसरे हाथ की दो उंगलियां मेरी बुर में..... मैं कौनसी पीछे रहने वाली थी.? मैंने भी तीन उंगलियां उनकी बुर में.. वो अभी भी अच्छी-खासी Tight थी.
"मेरा लड़का बड़ा ख्याल रखता है तेरा बहु. पहले से ही तेरी पिछवाड़े की कुप्पी में मक्खन मलाई भर रखा है, जिससे मरवाने में तुझे कोई दिक्कत ना हो." वो कस के गाण्ड में उँगली करती बोली.
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