मेरा इश्क़ जो मुझसे रूठ गया - प्यार की दर्द भरी...

Discussion in 'Hindi Sex Stories' started by 007, Jan 8, 2017.

  1. 007

    007 Administrator Staff Member

    Joined:
    Aug 28, 2013
    Messages:
    113,146
    Likes Received:
    2,108
    http://raredesi.com This story is part of 0 in the series

    उसके पैर टेब्ली की टाल के साथ ले मैं हिल रहे थे और उसके पैरों के साथ साथ वहाँ पे बैठे सारे मर्द शराब के साथ उसके नाचते हुए जिस्म के नशे मैं भी डूबे हुए थे.

    "वो! मेरी जान क्या नाचती हो, दिल करता है तुम्हाइन हमेशा के लिए अपने साथ ले जायों". वहाँ पे बैठे एक मर्द ने झूमते हुए उसे अंकल दी

    "मीयर्रा भाई, कब मोक़ा डोगी हमें के इसे हसीना जिस्म की पूजा कर सकन हम, एक बार हाँ तो करो मौह माँगे पैसे मिलन गे". एक और मर्द ने वहाँ बैठी एक औरत की तरफ डैखहते हुए कहा.

    थोड़ी देर बाद उस नाचती हुई लड़की ने अपना नाच खत्म क्या और सर झुका के उन हवस के मारी हुई नजरों को एक दफा देखा और फिर उस बारे से कमरे से बाहर आ गयी. कमरे से निकल कर वो सीधी के जरिए नीचे अपने कमरे मैं आ गयी और फौरन अपने उप्पर से वो सारा ज़ेवेर उतरने लगी, हर दफा इसे तरह ललचाई हुए नजरों के सामने नाच कर उसे अपना आप और भी ज्यादा सस्ता और गंदा महसूस होता था. लेकिन अभी भी उसे ये भगवान की किरपा ही लगती थी के वो नज़रैयण सिर्फ़ उसके जिस्म को देख सकती हैं हालाँकि वहाँ पे बैठे मर्दों का बस नहीं चल रहा होता था के वो उसके जिस्म के साथ लिपटे हर कपड़े को फाड़ कर उसे नंगा कर डैन लेकिन उनके हाथ अभी बँधे हुए थे लेकिन कब तक, ये वो सवाल था जिस का जवाब उसके पास नहीं था पर वो इतना जरूर जानती थी के अब उसके पास ज्यादा समय नहीं है, बहुत जल्द मीयर्रा भाई उसे उन भूखे भैदियों के सामने डाल देगी वो तो बस इसे बात का इंतजार कर रही थी के कोई उसका सही दाम लगाए ऐसा दाम जो सच मैं उसकी नाथ उतरने का हक़ अदा करता हो.

    इसे नर्क जैसी जिंदगी मैं उम्मीद का सिर्फ़ एक हे दिया था उसके पास लेकिन शायद अभी वो दिया खुद भी नहीं जनता था के कोई उसकी हल्की से रोशनी के सहारे कितने बारे बारे ख्वाब देख रहा है. अब शायद वो समय आ गया था के अब खुल के उसे अपने दिल की बात कर डैनी चाहिये इसे से पहले के बहुत देर हो जाए.

    मज़ेदार सेक्स कहानियाँ

    September 21, 2015June 17, 2016November 23, 2015September 27, 2015July 8, 2016

    अभिनव ने कॉलेज से बाहर आ कर एक लंबी साँस ली जैसे वो अपनी आज़ादी को महसूस करना चाहता हो. 21 साल उस ने इसे दिन का इंतजार क्या था, उस ने अपने हाथ मैं पकड़े सर्टिफिकेट को देखा, ये कगाज़ का टुकड़ा उसके लिए एक ऐसी जिंदगी की उम्मीद था जिस मैं कम आज़ कम उसे चुप कर या शर्मिंदा हो कर नहीं जीना पड़े गा. कॉलेज से निकालने के बाद वो सब से पहले नज़र आने वाली आत्म बूत मैं घुस गया, उसे अपना अकाउंट चेक करना था के उस मैं कितने पैसे हैं. अपना अकाउंट डैखहने के बाद उसकी खुशी दुख मैं बदल गयी, इतने सालों की मेहनत के बाद भी वो सिर्फ़ 20,000 जमा कर पाया था और इतने से पैसों मान वो जिंदगी जीना तो ख्वाब हे था जो वो चाहता था. उस ने साथ से गुजरती एक टैक्सी को हाथ दे कर रोका और इतने सालों के बाद भी अपने घर का पता बताते हुए उसकी नज़रैयण अपने आप हे शर्म से झुक गये देन. टैक्सी वाले ने मुस्कुराते हुए अपना मीटर नीचे कर के उसके बताए हुए पाते पे गाड़ी भागना शुरू कर दी.

    वो टैक्सी मैं बैठे हुए भी अभी तक उन्हीं सोचों मैं गुम था के अभी उसे कुछ साल उस नर्क मैं रहना पड़े गा जिसे वो इतने सालों से बर्दाश्त कर रहा था, अभी वो सोच हे रहा था के उसे और क्या करना होगा अपनी आज़ादी के लिए के अचानक टैक्सी झटका कहा के रुक गयी

    "लो साहब, आपकी मंजिल आ गयी". टैक्सी वाले ने जैसे उसे होश की दुनिया मैं वापस ले आया

    "क्या साहब, लगता है बहुत ही शोक़ीं मिज़ाज के हो, यहाँ पे तो लोग अपनी रतायं रंगीन करने आते हैं, आप तो दिन मैं हे यहाँ आ गये". टैक्सी वाले ने उसके हाथ से पैसे लायटे हुए एक बार फिर मुस्करा के कहा.

    अभिनव ने उसकी बात का कोई जवाब ना दया और उसे पैसे दे कर अपनी मंजिल के तरफ चल पड़ा. ये पहली बार..
     

Share This Page